इन घटनाओं का दर्द केवल घटना के दिन तक सीमित नहीं रहता. घायल व्यक्ति के शरीर पर जख्मों के निशान रहते हैं और परिवारों के जीवन में उस हिंसा की पीड़ा सालों तक बनी रहती है. सवाल केवल यह नहीं है कि कितनी गोलियां चलीं. सवाल यह है कि उन गोलियों ने कितने परिवारों की खुशियां छीनीं? कितने बच्चे अपने पिता के बिना बड़े हुए? कितनी पत्नियां अपने पति की तस्वीर के सहारे जीवन बिताने को मजबूर हुईं? कितने जवान आज अपने पैरों पर खड़े होने के लिए दूसरों के सहारे पर निर्भर हैं?
एक पैर गायब और गोलियों से छलनी, नक्सली हिंसा के शिकार लोगों ने बयां किया भयावह दर्द; चीर देगा कलेजा
