युद्ध के बाद पोलैंड का बड़ा फैसला खुद का सैटेलाइट नेटवर्क होगा तैयार
रूस-यूक्रेन युद्ध ने आधुनिक युद्ध में सैटेलाइट संचार की अहमियत दुनिया के सामने ला दी है। युद्ध के दौरान एलन मस्क की कंपनी SpaceX के Starlink नेटवर्क ने यूक्रेन को इंटरनेट और संचार बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी अनुभव से सबक लेते हुए पोलैंड अब अपना सुरक्षित सैटेलाइट संचार नेटवर्क तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, ताकि संकट या युद्ध की स्थिति में उसे किसी विदेशी निजी नेटवर्क पर पूरी तरह निर्भर न रहना पड़े।
पोलैंड की योजना लो-अर्थ ऑर्बिट यानी LEO में छोटे उपग्रहों का नेटवर्क विकसित करने की है। इस तरह के उपग्रह पृथ्वी के अपेक्षाकृत करीब परिक्रमा करते हैं, जिससे कम विलंबता के साथ तेज संचार संभव होता है। Starlink भी हजारों LEO उपग्रहों के जरिए दुनिया के कई हिस्सों में ब्रॉडबैंड इंटरनेट उपलब्ध कराता है।
यूक्रेन युद्ध ने दिखाई सैटेलाइट इंटरनेट की ताकत
रूस के हमलों के दौरान यूक्रेन के पारंपरिक संचार ढांचे को नुकसान पहुंचने के बाद Starlink टर्मिनलों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। सैन्य इकाइयों, सरकारी एजेंसियों और नागरिकों के बीच संपर्क बनाए रखने में इस तकनीक ने अहम भूमिका निभाई। युद्धक्षेत्र में ड्रोन संचालन और अन्य संचार जरूरतों में भी सैटेलाइट कनेक्टिविटी का इस्तेमाल हुआ। इस अनुभव ने यूरोपीय देशों को यह सोचने पर मजबूर किया है कि महत्वपूर्ण संचार व्यवस्था के लिए किसी एक विदेशी कंपनी पर निर्भरता रणनीतिक जोखिम पैदा कर सकती है। पोलैंड इसी वजह से अपनी स्वतंत्र क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रहा है।
सेना के लिए भी अहम होगा नेटवर्क
पोलैंड का प्रस्तावित नेटवर्क केवल सामान्य इंटरनेट सेवा तक सीमित रहने के बजाय सुरक्षित सरकारी और सैन्य संचार में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इसका उद्देश्य ऐसी व्यवस्था तैयार करना है जो जमीन पर मोबाइल टावर, फाइबर नेटवर्क या दूसरी संचार सुविधाएं बाधित होने के बावजूद काम करती रहे। पोलैंड रूस के साथ बढ़ते तनाव को देखते हुए पहले ही अपने रक्षा बजट और सैन्य क्षमताओं में तेजी से बढ़ोतरी कर रहा है। सैटेलाइट संचार क्षमता को भी भविष्य की रक्षा रणनीति के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।
भारत की क्या है तैयारी?
भारत भी अंतरिक्ष आधारित संचार और रक्षा क्षमताओं को लगातार मजबूत कर रहा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO के पास GSAT श्रृंखला के कई संचार उपग्रह हैं। इसके अलावा भारतीय सशस्त्र बलों के लिए समर्पित उपग्रह संचार क्षमताएं भी विकसित की गई हैं। नौसेना के लिए GSAT-7 और वायुसेना के लिए GSAT-7A जैसे उपग्रह सुरक्षित सैन्य संचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारत ने अंतरिक्ष आधारित सैन्य गतिविधियों के बेहतर समन्वय के लिए Defence Space Agency भी स्थापित की है। इसके अलावा निजी अंतरिक्ष कंपनियों को बढ़ावा देने के लिए IN-SPACe के माध्यम से नई नीतियां और अवसर दिए जा रहे हैं।
LEO ब्रॉडबैंड में भी बढ़ रही गतिविधियां
भारत में LEO सैटेलाइट ब्रॉडबैंड को लेकर निजी कंपनियों की गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं। Starlink के साथ OneWeb जैसी सेवाएं भारतीय बाजार में रुचि दिखा चुकी हैं। भारत का लक्ष्य दूरदराज और दुर्गम क्षेत्रों में सैटेलाइट के जरिए तेज इंटरनेट पहुंचाना भी है।
हालांकि पोलैंड जिस तरह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए Starlink जैसी स्वदेशी LEO व्यवस्था बनाने की दिशा में बढ़ रहा है, वैसा विशाल सरकारी नेटवर्क भारत में अभी विकास के अलग-अलग चरणों में मौजूद अंतरिक्ष और संचार क्षमताओं से अलग अवधारणा है। भारत की रणनीति फिलहाल सरकारी सैन्य उपग्रहों, नागरिक संचार उपग्रहों और निजी सैटेलाइट सेवाओं के मिश्रण पर आधारित दिखाई देती है। यूक्रेन युद्ध का सबसे बड़ा सबक यही है कि भविष्य के युद्ध केवल जमीन, समुद्र और हवा तक सीमित नहीं होंगे। अंतरिक्ष आधारित संचार, नेविगेशन और निगरानी आधुनिक रक्षा व्यवस्था के प्रमुख स्तंभ बन चुके हैं। पोलैंड की नई योजना इसी बदलती सुरक्षा रणनीति का उदाहरण है।
